आपने अब तक मोबाइल से जितनी भी फोन कॉल की हैं, आपकी आवाज़ आपके फोन से बाहर निकलने से पहले कंप्रेस हो चुकी होती है।

असल में आपकी आवाज़ सीधे सफर नहीं करती। आपकी आवाज़ का एक गणितीय रूप तैयार करके भेजा जाता है और दूसरी तरफ मौजूद फोन उस गणितीय जानकारी से आपकी आवाज़ को दोबारा बना लेता है।

और जिस व्यक्ति ने यह तरीका विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाई, उनका जन्म कानपुर में हुआ था।

उनका जन्म 10 मई 1933 को हुआ था। 1952 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में डिग्री ली। इसके बाद 1955 में बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) से इलेक्ट्रिकल कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। वहीं उन्होंने करीब तीन साल तक ध्वनिविज्ञान यानी Acoustics पढ़ाया।

1961 में वे अमेरिका की Bell Laboratories से जुड़ गए और अगले 35 साल तक वहीं काम किया।

उन्होंने जिस समस्या पर काम किया, वह सुनने में भले ही मामूली लगे, लेकिन उसका महत्व समझेंगे तो बात बहुत बड़ी लगती है।

अगर किसी की आवाज़ को बिल्कुल उसी रूप में भेजा जाए, जैसे वह पैदा होती है, तो उसमें बहुत ज्यादा बैंडविड्थ लगेगी। 1980 के दशक में जब मोबाइल फोन तेजी से फैलने लगे, तब मोबाइल नेटवर्क पर दबाव बढ़ने लगा।

रेडियो स्पेक्ट्रम सीमित है। हवा में जितनी जगह उपलब्ध है, उससे ज्यादा जगह बनाई नहीं जा सकती।

अगर आवाज़ को कंप्रेस करने का तरीका नहीं होता, तो मोबाइल फोन शायद आज की तरह आम लोगों तक नहीं पहुंच पाता। मोबाइल फोन कुछ गिने-चुने लोगों की महंगी सुविधा बनकर रह जाता, क्योंकि नेटवर्क में हर किसी की कॉल के लिए पर्याप्त जगह ही नहीं होती।

1966 से 1970 के बीच बिष्णु अटल ने Linear Predictive Coding (LPC) विकसित करने में महत्वपूर्ण काम किया।

इंसान की आवाज़ काफी हद तक पूर्वानुमानित (predictable) होती है। आप अभी जो आवाज़ निकाल रहे हैं, उसका संबंध कुछ क्षण पहले निकाली गई आवाज़ से होता है, क्योंकि आवाज़ बनाने वाली आपकी जीभ, गला और मुंह की बनावट लगभग वही रहती है।

इसलिए पूरी आवाज़ भेजने के बजाय सिर्फ कुछ ऐसे गणितीय आंकड़े भेजे जा सकते हैं, जो यह बताते हैं कि आवाज़ किस तरह पैदा हो रही है।

दूसरी तरफ का फोन उन्हीं आंकड़ों के आधार पर आपकी आवाज़ को दोबारा तैयार कर लेता है।

उनका शुरुआती सिस्टम सिर्फ 2,400 बिट प्रति सेकंड की दर से काम करता था, जो उस समय के हिसाब से बेहद कम था। अमेरिकी सेना ने इसे सुरक्षित टेलीफोन संचार के लिए भी अपनाया।

आवाज़ समझ तो आती थी, लेकिन वह बिल्कुल इंसानी आवाज़ जैसी नहीं लगती थी। उसमें थोड़ी रोबोट जैसी आवाज़ सुनाई देती थी।

इसके बाद अटल ने लगभग अगले 15 साल इस तकनीक को बेहतर बनाने में लगा दिए।

1985 में उन्होंने Manfred Schroeder के साथ मिलकर Code-Excited Linear Prediction (CELP) नाम की तकनीक प्रकाशित की।

आगे चलकर यही तकनीक दुनिया के कई डिजिटल मोबाइल और वॉइस-कम्युनिकेशन सिस्टमों की नींव बनी। GSM, CDMA और इंटरनेट पर होने वाली वॉइस कॉलिंग जैसी तकनीकों में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

बिष्णु अटल के नाम 16 अमेरिकी पेटेंट और कई अंतरराष्ट्रीय पेटेंट हैं।

1994 में उन्हें Bell Labs Fellow बनाया गया।

1987 में वे अमेरिका की National Academy of Engineering के सदस्य चुने गए।

और 2003 में Franklin Institute ने उन्हें इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में Benjamin Franklin Medal से सम्मानित किया।

उन्हें सम्मान देते समय Franklin Institute ने एक बेहद खूबसूरत बात लिखी थी—

“अगली बार जब आप अपने मोबाइल फोन से कॉल करें, तो बिष्णु अटल को याद कीजिए।”

लेकिन सच्चाई यह है कि अगली बार तो दूर, आज भी ज्यादातर लोग उनका नाम तक नहीं जानते।

अपने ही देश भारत में भी बहुत कम लोग जानते हैं कि मोबाइल पर हमारी आवाज़ को इतनी कम जगह में भेजने की इस तकनीक के पीछे एक भारतीय वैज्ञानिक का इतना बड़ा योगदान था।

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