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बंगाल में राजनीतिक प्रतिमान परिवर्तन : क्या भारत का शेष भाग भी इसका अनुसरण करेगा?

Byjansamvad bureau

Jul 3, 2026 #भारत की राजनीति


– देवेन्द्र कुमार बुडाकोटी


मई 2026 में पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आना राज्य की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत है। कभी बंगाल की राजनीति में प्रभावशाली शक्ति रहे वामपंथी दल आज भी अस्तित्व में हैं, किंतु उनका प्रभाव सीमित हो चुका है। वहीं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी बड़े पैमाने पर राजनीतिक परिदृश्य से हाशिए पर चली गई है। अधिकांश लोगों ने इसकी राजनीतिक पराजय और भाजपा के सत्ता में आने के बाद होने वाले सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों की कल्पना नहीं की थी। राजनीतिक विश्लेषक भी इस परिवर्तन का पूर्वानुमान नहीं लगा सके, जबकि बंगाल को कला, विज्ञान, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बुद्धिजीवियों—‘भद्रलोक’—की भूमि माना जाता रहा है।

गोपाल कृष्ण गोखले का प्रसिद्ध कथन, “आज बंगाल जो सोचता है, भारत कल वही सोचता है”, उस दौर में सामने आया था जब बंगाल ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत भारत के बौद्धिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक जागरण का केंद्र था। यह समझने के लिए कि क्या यह विचार आज भी प्रासंगिक है, बंगाल की राजनीतिक और बौद्धिक संस्कृति के ऐतिहासिक विकास तथा समकालीन राजनीति में भद्रलोक वर्ग की बदलती भूमिका का अध्ययन आवश्यक है।

ब्रिटिश शासन के दौरान कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश भारत की राजधानी (1911 तक) था। यहीं से औपनिवेशिक प्रशासन भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से का संचालन करता था। उन्नीसवीं शताब्दी में प्रशासनिक संस्थाओं के विस्तार के साथ बंगाल भारत के उन प्रथम क्षेत्रों में शामिल हुआ जहाँ कानून, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, साहित्य और राजनीतिक चिंतन जैसे क्षेत्रों में आधुनिक पश्चिमी शिक्षाका प्रसार हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में ही बंगाल पुनर्जागरण (Bengal Renaissance) का उदय हुआ, जो राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रवीन्द्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद जैसी महान विभूतियों से जुड़ा था। इन समाज सुधारकों ने सती प्रथा जैसी कुरीतियों को चुनौती दी, महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया, तर्कशील चिंतन को प्रोत्साहित किया और आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। परिणामस्वरूप बंगाल औपनिवेशिक भारत में बौद्धिक और राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में बंगाल औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति, श्रमिक आंदोलनों और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का भी प्रमुख आधार बना। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लगभग तीन दशकों तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की राजनीति पर प्रभुत्व बनाए रखा। किंतु सामाजिक असंतोष, श्रमिक संघर्षों, किसान आंदोलनों और कांग्रेस शासन के प्रति बढ़ती निराशा ने धीरे-धीरे वामपंथी राजनीति को मजबूत किया। 1977 में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा (Left Front) सत्ता में आया और लगातार 34 वर्षों तक शासन करता रहा। इस अवधि में पश्चिम बंगाल भारत में वामपंथी विचारधारा का सबसे सशक्त केंद्र बन गया।
ट्रेड यूनियन, किसान संगठन और बौद्धिक वर्ग व्यापक रूप से मार्क्सवादी राजनीति से प्रभावित थे। अनेक पर्यवेक्षकों को लगता था कि बंगाल में वामपंथी प्रभुत्व स्थायी है। किंतु लंबे शासन के बाद वामपंथ का पतन राजनीतिक विश्लेषकों और समाज वैज्ञानिकों दोनों के लिए आश्चर्य का विषय बना।
2011 में ममता बनर्जी और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का उदय एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन था। टीएमसी ने कांग्रेस और वाम दलों दोनों से नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ा तथा स्वयं को बंगाली अस्मिता और लोककल्याणकारी राजनीति पर आधारित क्षेत्रीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।
2014 के बाद एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बंगाल में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी। परंपरागत रूप से राज्य में कमजोर मानी जाने वाली भाजपा ने शहरी मध्यवर्ग, हिंदू मतदाताओं, अनुसूचित जातियों, आदिवासी समुदायों तथा टीएमसी और वामपंथ से निराश युवा मतदाताओं के बीच तेजी से अपना आधार बढ़ाया। राष्ट्रवाद, नागरिकता, सीमा सुरक्षा, धार्मिक पहचान तथा नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) जैसे मुद्दे सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गए। भाजपा ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सुभाष चंद्र बोस और स्वामी विवेकानंद जैसी ऐतिहासिक विभूतियों को केंद्र में रखकर बंगाल की सांस्कृतिक विरासत
की नई व्याख्या करने का प्रयास किया। इससे पुराने भद्रलोक वर्ग से जुड़ी वाम-उदारवादी बौद्धिक परंपराओं को चुनौती मिली।
हालाँकि, बंगाल का राजनीतिक इतिहास केवल अभिजात बुद्धिजीवियों तक सीमित नहीं रहा है। नील विद्रोह (Indigo Revolt), तेभागा आंदोलन, किसान संघर्ष, श्रमिक आंदोलनों और नक्सलबाड़ी विद्रोह जैसे जनआंदोलनों ने सिद्ध किया कि बंगाल की राजनीति आम जनता की व्यापक भागीदारी से भी निर्मित हुई है।

क्या बंगाल आज भी भारत का वैचारिक और राजनीतिक मार्गदर्शक है, जैसा कि गोखले के प्रसिद्ध कथन से संकेत मिलता है, यह बहस का विषय हो सकता है। किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि बंगाल आज भी भारत के सबसे राजनीतिक रूप से सक्रिय, वैचारिक रूप से संघर्षशील और सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली क्षेत्रों में से एक है। मई 2026 में भाजपा के बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या पश्चिम बंगाल वास्तव में एक नए राजनीतिक प्रतिमान परिवर्तन (Paradigm Shift) के दौर से गुजर रहा है। पुनर्जागरण और वामपंथी राजनीति के केंद्र से राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय पहचान और जमीनी लोकतंत्र के नए विमर्शों तक बंगाल की यह यात्रा भारत में हो रहे व्यापक सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों का प्रतिबिंब प्रतीत होती है।
ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या बंगाल आज भी भारत की राजनीति और समाज की भावी दिशा की एक प्रारंभिक झलक प्रस्तुत कर रहा है?

लेखक एक समाजशास्त्री तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र हैं। उनके शोध कार्यों का
उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर अमर्त्य सेन की पुस्तकों में किया गया है।

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