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प्रसंग में

शांति का कोई विकल्प नहीं

Byjansamvad bureau

May 9, 2025 #भारत-पाक युद्ध

आलेख : संजय पराते (उपाध्यक्ष) अखिल भारतीय किसान सभा छत्तीसगढ़

7-8 मई की मध्य रात्रि को भारतीय वायु सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर सहित पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में कुल 9 ठिकानों पर मिसाइल हमला किया। भारत सरकार का दावा है कि उसने पाक स्थित आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों को अपना निशाना बनाया है। इस हमले में 90 आतंकियों के ढेर होने का दावा किया जा रहा है, जिसमें जैश-ए-मोहम्मद के चीफ मसूद अज़हर के परिवार के 10 लोग भी शामिल है। इस लिहाज से यह हमला बालाकोट की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा जवाबी हमला है। दूसरी ओर, पाकिस्तानी सरकार का दावा है कि इस हमले में 3 साल की एक बच्ची सहित आम पाकिस्तानी नागरिकों की ही मौत हुई है और उसकी जवाबी कार्रवाई में भारतीय वायुसेना के 5 विमान भारतीय सीमा पर क्रैश हुए हैं।

इस हमले के बाद से ही भारत-पाक सीमा पर, विशेषकर जम्मू के सीमावर्ती पुंछ में दोनों ओर से भारी गोलाबारी जारी है, जिसके चलते एक भारतीय सैनिक और 4 बच्चों सहित 13 भारतीय नागरिकों के भी हताहत होने की खबर है और जानमाल का भारी नुकसान हुआ है। पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों की पाकिस्तान से सटे इलाकों में अफरा तफरी जारी है और आम भारतीय नागरिक किसी संभावित बड़े हमले की चपेट में आने ए बचने के लिए पलायन कर रहे हैं।

पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर भारतीय हमले को लेकर जश्न का माहौल है। हर तरफ “बदला-बदला” की ही चीख-पुकार मची हुई है और इसे इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे भारतीय सेना ने समूचे पाकिस्तान पर हमला करके विजय प्राप्त कर लिया है। इस युद्धोन्मादी चीख ने उन पीड़ित नागरिकों की चीख दबकर रह गई है, जो पूरी तरह से निर्दोष होने के बावजूद इन हमलों का शिकार हो रहे हैं, फिर चाहे वे सीमा के इस पार हो या उस पार। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि पाकिस्तान की गोलाबारी से भारतीय नागरिक ही हताहत हो और भारतीय पक्ष के हमलों से पाकिस्तानी नागरिकों को कोई नुकसान न हो। सीमाओं के आर-पार का कुछ-कुछ सच बहुत-बहुत देर बाद आम लोगों तक पहुंचता है, तब तक दोनों ओर काफी बर्बादी हो चुकी होती है। किसी भी युद्ध का सच यही है।

यह युद्धोन्माद दोनों ओर की सरकारों के लिए फायदेमंद है। पाकिस्तान की सरकार में वहां के नागरिकों का नहीं, सैन्य प्रतिष्ठान का कब्जा है और दिखावे की नागरिक सरकार पूरी तरह उसके अधीन है। पाकिस्तान में सेना की इच्छा के बिना कोई पत्ता नहीं खड़कता। उसने भारत सरकार के इन हमलों का जोरदार जवाब देने की बात कहकर आम पाकिस्तानियों में युद्धोन्माद की भावना जगाने की कोशिश की है और इस तरह अपने प्रति पनप रहे आम जनता के असंतोष को भारत के खिलाफ मोड़कर वैधता प्राप्त करने की कोशिश कर रही है।

भारत में भी यही स्थिति है। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार और पूरा संघी गिरोह इस मौके का उपयोग पाकिस्तान के खिलाफ आम भारतीयों में युद्धोन्माद जगाने, आम मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ नफरत फैलाने और कुल मिलाकर, देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दों से निपटना तो एक अलग मामला है, फिलहाल उसकी नजर बिहार और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों पर टिकी है, ताकि ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर वोटों की फसल काटी जा सके। जब कहने को कोई उपलब्धि न हो, आम जनता के असली मुद्दों पर कुछ करने का माद्दा न हो, तब यह ‘राष्ट्रवाद’ ही बड़ा काम आता है और राजनीति के अच्छे से अच्छे खिलाड़ी को धूल चटा देता है। संघी गिरोह इस काम में काफी पारंगत है और वह जानती है कि देश और देश से बाहर के आतंकियों को और उन्हें पालने पोसने वालों को वह मिट्टी में भले न मिला पाए, विपक्ष के पहलवानों की इस मुद्दे के सहारे मिट्टी पलीद तो जरूर कर सकती है। सत्ता को साधने के लिए संघी गिरोह कुछ भी गुलाटियां खा सकता है। अभी हाल ही में हमने उसे जातिगत जनगणना के नाम पर अपने दशकों पुराने स्टैंड से पलटी मारते देखा है।

जो लोग पाकिस्तान की सैन्य शक्ति की तुलना भारत की सैन्य ताकत से कर रहे हैं और बता रहे हैं कि भारत के सामने पाकिस्तान कहीं नहीं टिकता, वे यह भूल रहे हैं कि परमाणु समकक्षता इस नाबराबरी को मटियामेट कर देती है। चीन और तुर्किये आज पाकिस्तान के साथ खुलकर खड़ा है और हथियारों की आपूर्ति करने के लिए तैयार है। किसी वास्तविक युद्ध की स्थिति में अमेरिका दोनों युद्धरत देशों को अपने हथियार बेचकर मुनाफा कमाएगा। यूक्रेन से लड़ रहा रूस भारत के किसी काम आने वाला नहीं है। संयुक्त सुरक्षा परिषद से भी भारत को कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि 25 अप्रैल को सर्व-सम्मति से एक प्रस्ताव पारित प्रस्ताव में उसने पहलगाम में आतंकवादी हमले की निंदा तो की है, लेकिन इस हमले में पाकिस्तान और लश्कर-ए-तैयबा के हाथ होने के लगभग पुष्ट प्रमाणों के बाद भी प्रस्ताव में उसके नाम का उल्लेख नहीं किया है। प्रस्ताव की भाषा को नरम रखने में चीन का प्रभाव बताया जा रहा है, जो सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य भी है। गुट निरपेक्ष आंदोलन का नेता होने की हैसियत से पूरी दुनिया में भारत की जो साख थी, अब नहीं रही और इसके लिए भाजपा की वे नीतियां ही जिम्मेदार हैं, जो भारत को विदेश नीति के मामले में अमेरिका का पिछलग्गू बनाती है।

शांति का कोई विकल्प नहीं है और युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। धर्म, जाति, राष्ट्रवाद जैसी नशीले मुद्दों से बाहर आकर उन इंसानी जिंदगियों के बारे में सोचने की जरूरत है, जो युद्ध का कोई पक्ष नहीं होते, लेकिन उन्हें जबरन इधर या उधर का पक्षधर बनाया जाता है, ताकि शासक वर्गों के स्वार्थ की भट्टी में उनकी बलि दी जा सके। इस युद्धरत समय में शांति की आवाज बुलंद करना ही राष्ट्रभक्ति है, चाहे इस समय यह आवाज कितनी ही कमजोर क्यों न हो। इस विश्व की और इस उपमहाद्वीप की सभ्यता को युद्ध नहीं, शांति ही आगे बढ़ाएगी। अतीत का सार्वकालिक सबक भी यही है। इस युद्ध के विस्तार को रोकना ही दोनों देशों की आम जनता के हित में है।

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