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प्रसंग में

एक गीत, जिसने पूरे देश में क्रांति की अलख जगा दी 

Byjansamvad bureau

June 26, 2025 #वंदेमातरम्

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला (दून विश्वविद्यालय) देहरादून, उत्तराखंड


स्वतंत्रता आंदोलन के दौराम वंदेमातरम् गीत ने जनमानस में राष्ट्रीयता की अलख जगाई थी. आज भी राष्ट्रीय गीत सुनकर, प्रत्येक भारतीय गर्वित अनुभव करता है. इसी राष्ट्रीय गीत के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी की आज जयंती है. अपने गीत से उन्होंने शस्यश्यामला भारत भूमि की अर्चना की. बंकिमचंद्र चटर्जी को प्रख्यात उपन्यासकार, कवि, गद्यकार और पत्रकार के रूप में जाना जाता है. वे बांग्ला के अतिरिक्त, दूसरी भाषाओं पर भी समान अधिकार रखते थे. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म, 27 जून, 1838 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के, कांठलपाड़ा ग्राम में हुआ. वे एक समृद्ध और परंपरागत बंगाली परिवार में जन्मे थे. उन्होंने मेदिनीपुर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की. इसके बाद बंकिम चंद्र चटर्जी ने हुगली के एक महाविद्यालय में प्रवेश लिया. किताबों के प्रति बंकिम चंद्र चटर्जी की रुचि बचपन से ही थी. वे पहले आंग्ल भाषा की ओर भी आकृष्ट थे, पर बाद में उन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव उत्पन्न हुआ. वे एक मेधावी व मेहनती छात्र थे. पढ़ाई के साथ- साथ खेलकूद में भी उनकी रुचि थी. वर्ष 1856 में उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया. वे पहले भारतीय थे जिन्होंने उस दौर में प्रेसीडेंसी कॉलेज से, बीए की उपाधि ग्रहण की. उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की. वर्ष 1858 में डिप्टी मजिस्ट्रेट का पदभार संभाला. बंकिमचंद्र चटर्जी को बंगला और संस्कृत साहित्य की अच्छी जानकारी थी. सरकारी नौकरी में रहते हुए, उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीयों पर अंग्रेजों के दमनचक्र को बहुत नजदीक से देखा था. सरकारी नौकरी में होने के कारण बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय किसी सार्वजनिक आन्दोलन में प्रत्यक्षतः भाग नहीं ले सकते थे, पर उनका मन कचोटता था. इसलिए उन्होंने साहित्य के माध्यम से, स्वतंत्रता आन्दोलन में अपना योगदान देने का संकल्प लिया. बंकिम चंद्र चटर्जी कविता और उपन्यास दोनों लिखते थे. वे दोनों ही विधाओं में न केवल पारंगत बने, बल्कि अपनी बेहतरीन रचनाओं से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया. साल 1865 में उनकी प्रथम बांग्ला कृति दुर्गेशनंदिनी प्रकाशित हुई. उनकी अन्य रचनाओं में मृणालिनी,विषवृक्ष, चंद्रशेखर, रजनी, देवी चौधरानी और राजसिंह प्रमुख है

. राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम् की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास आनंदमठ में की थी. यह उपन्यास वर्ष 1882 में प्रकाशित हुआ. आनंदमठ में ईस्ट इंडिया कंपनी से वेतन के लिए लड़ने वाले भारतीय मुसलमानों और संन्यासी ब्राह्मण सेना का वर्णन किया गया है. वन्देमातरम् गीत इतना लोकप्रिय था कि, स्वयं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसका संगीत तैयार किया. बंकिमचंद्र चटर्जी की रचनाओं के अनुवाद दुनिया की कई भाषाओं में हुए. उनकी कई रचनाओं पर फिल्में भी बनीं. शासकीय सेवा में रहते हुए भी,उन्होंने स्वातंत्र्य चेतना जागृत करने में, अपनी महती भूमिका निभाई आनन्द मठ में देश को मातृभूमि मानकर उसकी पूजा करने और उसके लिए तन-मन और धन समर्पित करने वाले युवकों की कथा थी, जो स्वयं को ‘सन्तान’ कहते थे। इसी उपन्यास में वन्देमातरम् गीत भी समाहित था। इसे गाते हुए वे युवक मातृभूमि के लिए मर मिटते थे। जब यह उपन्यास बाजार में आया, तो वह जन-जन का कण्ठहार बन गया। इसने लोगों के मन में देश के लिए मर मिटने की भावना भर दी। वन्देमातरम् सबकी जिह्ना पर चढ़ गया। इसे गाते हुए वे युवक मातृभूमि के लिए मर मिटते थे। जब यह उपन्यास बाजार में आया, तो वह जन-जन का कण्ठहार बन गया। इसने लोगों के मन में देश के लिए मर मिटने की भावना भर दी। वन्देमातरम् सबकी जिह्ना पर चढ़ गया।1906 में अंग्रेजों ने बंगाल को हिन्दू तथा मुस्लिम आधार पर दो भागों में बाँटने का षड्यन्त्र रचा। इसकी भनक मिलते ही लोगों में क्रोध की लहर दौड़ गयी। 7 अगस्त, 1906 को कोलकाता के टाउन हाल में एक विशाल सभा हुई, जिसमें पहली बार यह गीत गाया गया। इसके एक माह बाद 7 सितम्बर को वाराणसी के कांग्रेस अधिवेशन में भी इसे गाया गया। इससे इसकी गूँज पूरे देश में फैल गयी।स्वतन्त्रता के लिए होने वाली हर सभा, गोष्ठी और आन्दोलन में वन्देमातरम् का नाद होने लगा।यह देखकर शासन के कान खड़े हो गये। उसने आनन्द मठ और वन्देमातरम् गान पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इसे गाने वालों को सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे जाते थे; लेकिन प्रतिबन्धों से भला भावनाओं का ज्वार कभी रुक सका है ? अब इसकी गूँज भारत की सीमा पारकर विदेशों में पहुँच गयी। क्रान्तिवीरों के लिए यह उपन्यास गीता तथा वन्देमातरम् महामन्त्र बन गया। वे फाँसी पर चढ़ते समय यही गीत गाते थे। इस प्रकार इस गीत ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में अतुलनीय योगदान दिया था।

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