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उत्तराखंड

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आवारा कुत्तों की समस्या

Byjansamvad bureau

August 17, 2025 #आवारा कुत्ते

-देवेन्द्र कुमार बुडाकोटी, एक समाजशास्त्री हैं, जो 40 वर्षों से NGO और विकास क्षेत्र में कार्यरत हैं। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पूर्व छात्र हैं 

भारत में अधिकांश बड़े मुद्दे—चाहे वे नीति से जुड़े हों या अधिकारों से—अंततः सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंचते हैं। आश्चर्य की बात है कि स्थानीय निकायों से जुड़े आवारा कुत्तों का मामला भी अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। यह न केवल नगरपालिका कानूनों की कमजोरी को दर्शाता है, बल्कि स्थानीय प्रशासन की अक्षमता को भी उजागर करता है।

भारत में दुनिया में सबसे अधिक आवारा कुत्ते और बिल्लियां पाई जाती हैं। इसके साथ ही, भारत में रेबीज से होने वाली मौतों की संख्या भी विश्व में सबसे अधिक है—लगभग 36%। यह आंकड़े इस समस्या की गंभीरता और व्यापकता को दिखाते हैं, जो अब सिर्फ स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है।

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और एनिमल बर्थ कंट्रोल (कुत्ते) नियम, 2001 जैसे कानून आवारा कुत्तों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये कानून उनके स्थानांतरण, हटाने या मारने पर रोक लगाते हैं। हालांकि ये कानून मानवीय दृष्टिकोण से बनाए गए हैं, परंतु बढ़ती जनसंख्या और कुत्तों के हमलों के बीच ये कानून आम जनता की सुरक्षा से टकराने लगे हैं।

11 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और एनसीआर की सड़कों से सभी आवारा कुत्तों को हटाकर शेल्टर में रखने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और पालतू पशु प्रेमियों ने विरोध प्रदर्शन किया। ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध पशु अधिकार कार्यकर्ता फिलिप वोलन ने भी चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे शेल्टर “यातना गृह” बन सकते हैं।

शहरी पालतू पशु प्रेमियों की प्रतिक्रिया भावनात्मक रूप से इस डर पर आधारित थी कि कहीं उनके पालतू ‘रॉकी’, जो घर के अंदर रहते हैं और अंग्रेजी कमांड जैसे “कम”, “बैठो”, “शेक हैंड” को समझते हैं, भी इस आदेश की चपेट में न आ जाएं। जबकि ग्रामीण ‘टॉमी’, जो पूरे गांव का हिस्सा है और खुले में घूमता है, उसे लेकर कोई चिंता नहीं जताई गई।

इस आदेश पर तीखी प्रतिक्रिया के चलते, पहले दिए गए दो न्यायाधीशों के फैसले को रोक दिया गया और अब प्रधान न्यायाधीश ने तीन न्यायाधीशों की पीठ गठित की है। अब सभी पशु प्रेमियों को इस पर आने वाले अंतिम निर्णय का इंतजार है।

यह पूरा प्रकरण शहरी मध्यम वर्ग की ताकत को भी दर्शाता है, जो मीडिया और न्यायालय के माध्यम से अपनी बात प्रभावी ढंग से उठा सकता है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि यही वर्ग अन्य सामाजिक मुद्दों जैसे कि सड़क पर रहने वाले बच्चे, भिक्षावृत्ति, बेघर लोग, और सड़क सुरक्षा जैसे विषयों पर भी उतनी ही जागरूकता दिखाए।

इन नागरिक समूहों को संस्थागत रूप देना चाहिए, ताकि ये न केवल जानवरों के लिए बल्कि अन्य जनहित मुद्दों के लिए भी आवाज़ उठा सकें और इनकी बात विधायकों तक पहुंचे, जिससे प्रभावी सार्वजनिक नीति बन सके।

जो मुद्दा स्थानीय स्तर पर सुलझना चाहिए था, वह अब राष्ट्रीय बहस बन चुका है। जानवरों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और प्रशासनिक क्षमता के साथ संतुलित करना भी उतना ही आवश्यक है।

आख़िरकार हमें भारतीयों को याद रखना चाहिए कि भारत एक महान लोकतंत्र भी है, जहाँ आवारा कुत्तों का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा सुना जाता है।

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