
यह लेख भारत में सरकारी नौकरियों के प्रति युवाओं के गहरे जुनून और उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का एक सटीक और विचारोत्तेजक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह उस विरोधाभास को उजागर करता है जहाँ समाज सरकारी व्यवस्था की आलोचना तो करता है, लेकिन उसी का हिस्सा बनने की तीव्र इच्छा भी रखता है।
देश में कुल सरकारी नौकरियों की संख्या करीब 1.4 करोड़ है, यानी हर 100 में से केवल 2 लोगों को ही सरकारी नौकरी मिल सकती है। इसका अर्थ है कि मात्र 1.4% कामकाजी आयु वर्ग के लोग ही सरकार में नौकरी पा सकते हैं। लेकिन फिर भी सरकारी नौकरी की होड़ खत्म नहीं होती।
इसका कारण है—नौकरी की स्थिरता और सुरक्षा की भावना, जो सरकारी क्षेत्र से जुड़ी होती है। वहीं दूसरी ओर, निजी क्षेत्र में अस्थिरता और प्रतिस्पर्धा का डर है। लेकिन विडंबना देखिए—जहाँ लोग सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं, वहीं अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं और इलाज के लिए निजी अस्पतालों में भागते हैं। सरकारी व्यवस्था को कोसते हैं, पर उसी का हिस्सा बनने की लालसा रखते हैं।
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC) और राज्य लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाएं, युवाओं के लिए रोजगार के मंदिर बन गई हैं। उन्हें लगता है कि ये संस्थाएं उन्हें नौकरी दिलाने के लिए बनी हैं। यह मानसिकता उस “माई-बाप सरकार” सोच का हिस्सा है, जहाँ सरकार से जीवन के हर पहलू की जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है। कोचिंग संस्थान और शिक्षा प्रणाली भी इसी सोच को पोषित करती हैं।
UPSC की सिविल सेवा परीक्षा को ही लें—हर साल करीब 12 से 15 लाख अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा में बैठते हैं। इनमें से केवल 10 से 12 हजार मुख्य परीक्षा के लिए चयनित होते हैं, करीब 3 हजार को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है, और अंत में सिर्फ 900 से 1000 को सेवा में नियुक्त किया जाता है। IAS जैसी प्रतिष्ठित सेवा में तो सिर्फ 100 पद ही होते हैं। यानी 15 लाख में से 0.006% को ही यह सफलता मिलती है। फिर भी लाखों युवा वर्षों तक इसी सपना के पीछे भागते रहते हैं।
हाल ही में राजस्थान में ग्रुप D की 53,747 पदों की भर्ती के लिए 21 लाख आवेदन आए। ये पद केवल 10वीं पास के लिए थे, लेकिन अधिकांश आवेदक इससे कहीं अधिक योग्य थे। यह सरकारी नौकरी की लालसा ही है, जो युवाओं को किसी भी कीमत पर ‘सरकारी बाबू’ बनने को प्रेरित करती है।
सरकार चाहे तो UPSC जैसे संस्थानों के उम्मीदवारों से SSC या राज्य स्तरीय नौकरियों के लिए चयन कर सकती है, लेकिन अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित कर लाखों युवाओं को वर्षों तक “प्रतीक्षा कक्ष” में रखा जाता है।
जब भारत निकट भविष्य में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, तब यह विचार करना आवश्यक है—अगर हमारे होनहार युवा सिर्फ सरकारी नौकरी के पीछे भागते रहेंगे, तो निजी क्षेत्र और कॉरपोरेट दुनिया का नेतृत्व कौन करेगा? क्या हम 2047 तक विकसित राष्ट्र बन पाएंगे?
क्या सरकार अब भी “मुफ्तखोरी के पंडाल” लगाने की योजना बना रही है या फिर देश के युवाओं को कौशल विकास, रोजगार सृजन, और स्वतंत्र करियर निर्माण की दिशा में ठोस मार्गदर्शन देगी?
हकीकत यह है कि सरकारी नौकरी का सपना अब एक भ्रम बन चुका है—जिससे जितना जल्दी बाहर निकला जाए, उतना बेहतर।
लेखक देवेंद्र कुमार बुडाकोटी समाजशास्त्री हैं और चार दशकों से विकास क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।
