इसके लेखक देवेन्द्र बुडाकोटी एक समाजशास्त्री है और जेएनयू के छात्र रहे है। उनके शोध कार्य का उल्लेख नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रोफेसर डॉक्टर अमर्त्य सेन ने अपनी किताबों मे भी मिलता है। इस लेख के माध्यम से उन्होंने सरकारी अधिकारियों के तबादले व उसके पीछे छिपे सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उजागर करते हुए बताने की कोशिश की है कि कैसे यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया न होकर हमारे समाज में सत्ता की संरचना और उसकी धारणाओं का एक महत्वपूर्ण प्रतिबिंब बन चुका है। प्रस्तुत है उनके विश्लेषण का सार ….
- तबादला: सिर्फ स्थानांतरण नहीं, शक्ति का प्रदर्शन
एक अधिकारी का तबादला महज एक कर्मचारी के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की सूचना नहीं है। यह राज्य या ‘सरकार’ की उपस्थिति का एक निरंतर स्मरण है। यह खबरें अवचेतन रूप से जनता को यह संदेश देती हैं कि व्यवस्था पर नियंत्रण ‘सरकार’ का है और ये अधिकारी उसी सत्ता के प्रतिनिधि हैं। यह “माई-बाप सरकार” की औपनिवेशिक मानसिकता को पोषित करता है, जहाँ नागरिक याचक और अधिकारी दाता की भूमिका में होते हैं।
- सिविल सेवा का ‘अभिजात्य’ स्वरूप
सिविल सेवा परीक्षा की कठिन प्रक्रिया के बाद ,लाखों में से कुछ सौ लोगों का चुना जाना इस सेवा को एक ‘अभिजात्य क्लब’ का दर्जा देता है। यह चयन प्रक्रिया ही इन अधिकारियों को समाज में एक विशेष स्थान और सम्मान प्रदान करती है। इसलिए, जब उनका तबादला होता है, तो यह किसी आम कर्मचारी का तबादला नहीं, बल्कि एक ‘अभिजात्य’ व्यक्ति का स्थानांतरण होता है, जो समाज के लिए कौतूहल और चर्चा का विषय बन जाता है।
- सामाजिक दृश्यता और प्रतिष्ठा का पुनर्स्थापन
तबादलों की खबरें इन अधिकारियों की “सामाजिक दृश्यता” (social visibility) को बनाए रखती हैं। यह समाज को याद दिलाता है कि ये अधिकारी कौन हैं और व्यवस्था में उनका क्या महत्व है। यह एक तरह से उनके पद से जुड़ी सत्ता और प्रतिष्ठा को बार-बार स्थापित करने का काम करता है। मीडिया भी इसे एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में प्रस्तुत करता है, क्योंकि यह समाज के एक बड़े वर्ग के लिए रुचि का विषय होता है।
- औपनिवेशिक मानसिकता की विरासत
यह पूरी व्यवस्था, हमारी औपनिवेशिक विरासत का ही एक हिस्सा है। ब्रिटिश राज में ‘सरकारी अफसर’ को शासक वर्ग का हिस्सा माना जाता था, जो आम जनता से अलग और ऊपर था। दुर्भाग्य से, स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी यह मानसिकता पूरी तरह से नहीं बदली है। आज भी एक जिलाधिकारी या पुलिस कप्तान को ‘मालिक‘ की तरह देखने की प्रवृत्ति समाज में मौजूद है।
निष्कर्ष
जब तक यह संरचना और मानसिकता बनी रहेगी, तब तक अधिकारियों के तबादले सिर्फ एक प्रशासनिक सूचना न होकर, शक्ति के प्रदर्शन और सामाजिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहेंगे। इसे बदलने के लिए केवल प्रशासनिक सुधार ही नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता है, जहाँ ‘सिविल सेवक’ को वास्तव में जनता का ‘सेवक’ माना जाए, न कि ‘शासक’। क्या हम इस चिंतन के माध्यम से इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संवाद की शुरुआत करने को तैयार हैं।
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