31 मई 2025 को आधिकारिक रूप से निदेशक पद से कार्यमुक्त हो चुके श्री ब्रजेश कुमार मिश्रा अब भी यूकेएमआरसी के कार्यालय में नियमित रूप से आ रहे हैं। यह स्थिति अनेक सवाल खड़े करती है:
• आखिर वे किस अधिकार से ऑफिस आ रहे हैं?
• किसकी अनुमति से उन्हें प्रवेश दिया जा रहा है?
• क्या अभी भी वे किसी पद पर बने हुए हैं, या फिर यह प्रशासनिक लापरवाही है?
बड़ा सवाल यह है कि हाल ही में आयोजित यूकेएमआरसी के प्रबंध निदेशक (MD) पद के इंटरव्यू में ब्रजेश मिश्रा भी शामिल हुए थे, और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उनका चयन पहले से तय था।
क्या यह इंटरव्यू केवल औपचारिकता था ?
क्या चयन पहले ही कर लिया गया था और अन्य उम्मीदवारों को सिर्फ दिखावे के लिए बुलाया गया ?
गौरतलब है कि श्री मिश्रा 65 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। यदि वे एमडी बनाए जाते हैं, तो वे अगले 5 वर्षों तक इस पद पर बने रह सकते हैं ,क्या इसके पीछे कोई खास वजह है ?
यही नहीं, श्री ब्रजेश मिश्रा इससे पहले लगभग 5 वर्षों तक निदेशक के पद पर रहे, और उनके पहले एमडी रहे श्री जितेंद्र त्यागी, लगभग 8 वर्षों तक इस संस्था से जुड़े रहे — लेकिन आज तक एक भी प्रोजेक्ट धरातल पर नहीं उतर पाया है।
यह संस्था 2015 से राज्य सरकार के फंड से संचालित हो रही है, और हर साल करोड़ों रुपये वेतन, भत्तों और ऑफिस रेंट पर खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि उत्तराखंड मेट्रो का कोई भी कार्य अब तक शुरू नहीं हुआ है।
क्या यह संस्था केवल कुछ रिटायर्ड अधिकारियों के लिए “वेतन युक्त पेंशन योजना” बनकर रह गई है?
क्या जनता के पैसे का ऐसा दुरुपयोग स्वीकार्य है?
इन तमाम सवालों के जवाब सरकार और जिम्मेदार विभागों को देने होंगे। जब तक पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक यह आशंका बनी रहेगी कि उत्तराखंड मेट्रो केवल चुनिंदा अफसरों के हितों को साधने वाला एक सफेद हाथी बन चुका है।
