लोकतंत्र के “#पहरेदार” भारत के निर्वाचन आयोग की अपनी “#पहरेदारी” पर ही गंभीर सवाल उठें तो लोकतंत्र को लेकर चिंता स्वाभाविक है। सवाल राजनीतिक दलों से उठे तो उसे राजनीति कहा जा सकता है , लेकिन सवाल संस्थागत ही हों तो फिर बात निश्चित ही दूर तक जायेगी। सवाल बाहर से नहीं इस बार अंदर से ही उठा है , निर्वाचन आयोग में “वोटों” की पहरेदारी ठीक से नहीं हो रही है । अभी जो निर्वाचन आयोग को लेकर मामला चल रहा है, वह काफी गंभीर है।
#SIR (Special Intensive Revision) यानी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण और आयोग के भीतर ही बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ है जो देश के लोकतंत्र के लिए ही “खतरा” है । आयोग के दो आयुक्तों की आपत्तियों के बाद मतदाता सूची में मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त सवालों के घेरे में हैं ।
यह कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं है , इसका खुलासा “द इंडियन एक्सप्रेस” समाचार पत्र ने पूरे तथ्यों के साथ किया है । इंडियन एक्सप्रेस का यह खुलासा पूरे देश में आज चर्चा और चिंता का विषय बना हुआ है।
#इंडियनएक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक मुताबिक निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। ये आपत्तियां नए मतदाताओं के नाम जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, अपीलों तथा मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम से जुड़े मामलों पर थीं।
कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाया कि कार्रवाई उनकी जानकारी या स्वीकृति के बिना कैसे हुई। रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद आयोग कहता है कि ये टिप्पणियां और आपत्तियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और पिछले एक वर्ष में आयोग के सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने इन 14 नोट्स के अस्तित्व से इनकार नहीं किया है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।अगर सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए, तो इन 14 आपत्तियों का हुआ क्या?
क्या आपत्तियों पर अलग से चर्चा हुई? क्या पूर्ण आयोग ने उन्हें खारिज किया? क्या आपत्तियों के बाद संबंधित फैसलों को फिर से आयोग के सामने रखा गया? क्या बाद में सभी तीनों आयुक्तों ने उन फैसलों को मंजूरी दी? अगर ऐसा हुआ तो उसका रिकॉर्ड क्या है?
आयोग कहता है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मत थे, तो फिर उन आपत्तियों को केवल “सुझाव” कहकर आगे बढ़ जाने के बजाय देश को यह बताना भी जरूरी है कि उन सुझावों और आपत्तियों का अंतिम निस्तारण कैसे हुआ। इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार आयोग ने यह स्पष्ट नहीं किया कि #Form6 में बदलाव को किसने मंजूरी दी, पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में अपीलें किसने अधिकृत कीं, #ECINet के ऑडिट के प्रस्ताव का क्या हुआ और मई से अगस्त के बीच पूर्ण आयोग की बैठक क्यों नहीं हुई।
Form-6 का मामला तो इस पूरे विवाद को और गंभीर बना देता है। नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी मांगी गई।
रिपोर्ट के अनुसार मई में ही निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी ने कहा था कि कानून में निर्धारित Form-6 को नियमों में संशोधन किए बिना बदला नहीं जा सकता। 19 मई को संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। इसके बावजूद बाद में ऑनलाइन पोर्टल पर बदलाव दिखाई दिया। अगस्त में संधू ने इसे “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए हटाने की मांग की।
अब सवाल बहुत सीधा है कि जब दो निर्वाचन आयुक्त पहले ही इस बदलाव की #वैधानिकता पर आपत्ति कर चुके थे, तो फिर यह बदलाव लागू कैसे हुआ?किसने किया?किस अधिकार से किया?किस प्रक्रिया से किया? और यदि बाद में आयोग ने इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया था, तो वह निर्णय कब और कैसे हुआ?
यही सवाल मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम को लेकर भी उठता है। दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटा के नियंत्रण के केंद्रीकरण और अधिकारियों की भूमिका को लेकर चिंता जताई। यहां मामला सिर्फ कंप्यूटर सिस्टम का नहीं है। मामला यह है कि किसके पास मतदाता के नाम को जोड़ने, हटाने या उसमें बदलाव करने की वास्तविक पहुंच और अधिकार है।
मतदाता सूची कोई सामान्य सरकारी सूची नहीं है।उस सूची में दर्ज नाम किसी नागरिक के #लोकतांत्रिकअधिकार का आधार है। इसलिए अब देश को केवल चुनाव के दिन पड़े वोट का हिसाब नहीं चाहिए। देश को उस #वोट तक पहुंचने वाली पूरी प्रक्रिया का भी हिसाब चाहिए। किसका नाम जुड़ा?किसका नाम हटा?किसका नाम बहाल हुआ?किसके आदेश पर हुआ , किस नियम के तहत हुआ?और जब आयोग के भीतर ही किसी फैसले पर आपत्ति दर्ज हुई, तो उस आपत्ति का क्या हुआ?
देश में विपक्ष लंबे समय से चुनावों में #वोट #चोरी और “चौकीदार चोर है” जैसे राजनीतिक आरोप लगाता रहा है। इन आरोपों के सही या गलत होने पर राजनीतिक बहस अपनी जगह है। लेकिन अब निर्वाचन आयोग के ही तीन में से दो आयुक्तों की ओर से पिछले दस महीनों में दर्ज की गई कम से कम 14 लिखित आपत्तियों का सामने आना एक अलग और गंभीर सवाल खड़ा करता है । सवाल यह है कि जिस संस्था पर देश के हर वोट की #रखवाली की जिम्मेदारी है, उसके भीतर फैसले आखिर किस तरह लिए जा रहे थे?
अब बात सिर्फ किसी एक चुनाव, किसी एक राजनीतिक दल या एसआईआर की नहीं रह गई है। बात उस भरोसे की है जिस पर चुनावी #लोकतंत्र खड़ा है। भारत का निर्वाचन आयोग कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। यह देश मै लोकतंत्र को सुनिश्चित करने वाली एक संविधान प्रदत्त अधिकार संपन्न स्वतंत्र संस्था है।
यह संस्था किसी को मनमानी का अधिकार नहीं देती है इसकी जवाबदेही देश के #संविधान और देश की जनता के प्रति है । इसका दायित्व इस भरोसे को बनाये रखना है जिसकी बुनियाद पर देश का लोकतंत्र टिका हुआ है।
लोकतंत्र में सत्ता का रास्ता जिस चुनावी व्यवस्था से होकर गुजरता है, उस व्यवस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा होना जरूरी है। मतदाता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में नियम के मुताबिक जुड़ा है, किसी का नाम नियम के मुताबिक हटाया गया है और चुनाव से जुड़े हर महत्वपूर्ण फैसले कानून और संस्थागत प्रक्रिया के अनुसार लिए गए हैं।
पूरे मामले में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल है ।निर्वाचन आयोग का अपना पक्ष भी सामने है और उसके भीतर से सामने आई आपत्तियां भी सार्वजनिक हो चुकी हैं। अब जरूरत दोनों के बीच उठे सवालों को साफ करने की है।
लोकतंत्र में मतदाता से पारदर्शिता की उम्मीद की जाती है। राजनीतिक दलों से जवाब मांगा जाता है। सरकारों से जवाब मांगा जाता है। फिर लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में से एक निर्वाचन आयोग से भी पारदर्शिता की अपेक्षा है ।
निर्वाचन आयोग के लिए यह किसी राजनीतिक दल को जवाब देने का सवाल नहीं है। यह देश के मतदाता को जवाब देने का सवाल है क्योंकि चुनाव में केवल वोट पड़ना महत्वपूर्ण नहीं है। उस वोट का सुरक्षित रहना, मतदाता सूची में सही नाम होना और उस पूरी प्रक्रिया का निष्पक्ष और पारदर्शी होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने वोट पड़े?सवाल यह भी है कि हर वोट तक पहुंचने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी ? शायद इसीलिए आज देश के एक आम नागरिक और आम मतदाता को स्पष्टता से कहना पड़ रहा है कि अब तो हर वोट का “हिसाब ” चाहिए।
#indianexpress
साभार : योगेश भट्ट
