,2 सितंबर, 2025 को उत्तराखंड मसूरी गोलीकांड की 31वीं बरसी पर शहीदों को याद कर रहा है। यह दिन उत्तराखंड के इतिहास में एक ‘काला दिन’ के रूप में दर्ज है, जब राज्य की मांग कर रहे निहत्थे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोलियां बरसा दी थीं। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं, हालांकि आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखंड आज भी अधूरा है, इस बात की कसक भी साफ महसूस की गई।
मसूरी गोलीकांड: जब गोलियों से गूंजी थी शांत वादियां
2 सितंबर, 1994 को मसूरी के झूलाघर में आंदोलनकारी, खटीमा में हुए गोलीकांड के विरोध में शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे। तभी पीएसी और पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। इस बर्बर कार्रवाई में छह आंदोलनकारी— बलबीर सिंह नेगी, धनपत सिंह, राय सिंह बंगारी, मदनमोहन ममगाईं, बेलमती चौहान, और हंसा धनाई —शहीद हो गए। गोलीबारी का विरोध करने वाले तत्कालीन डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी को भी गोली मार दी गई, जिन्हें बाद में शहीद का दर्जा दिया गया।
मुख्यमंत्री की ऐतिहासिक घोषणाएं
शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मुख्यमंत्री ने कई घोषणाएं कीं:
‘आंदोलनकारी मॉल रोड’: मसूरी की प्रसिद्ध मॉल रोड का नाम बदलकर ‘आंदोलनकारी मॉल रोड’ किया जाएगा, जो राज्य आंदोलन के संघर्ष को समर्पित होगी।
पटरी व्यापारियों के लिए वेंडर जोन: मसूरी के पटरी व्यापारियों के लिए एक स्थायी वेंडर जोन बनाया जाएगा, ताकि उन्हें सम्मानजनक आजीविका और सुरक्षा मिल सके।
अधूरे सपने और न्याय का इंतजार
भले ही 42 शहादतों के बाद 9 नवंबर, 2000 को उत्तराखंड राज्य का गठन हो गया, लेकिन 31 साल बाद भी कई घाव हरे हैं:
दोषियों को सजा नहीं: सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आज तक खटीमा और मसूरी गोलीकांड के दोषियों को सजा नहीं मिल पाई है।
पहाड़ों का दर्द: जिन सपनों के लिए यह राज्य बना था, वे आज भी अधूरे हैं। पहाड़ों से पलायन जारी है, गांव खाली हो रहे हैं और विकास के लिए कोई ठोस नीति का अभाव है।
आज का दिन उत्तराखंड वासियों के लिए उन बलिदानों को याद करने का दिन है, जिनकी नींव पर इस राज्य का निर्माण हुआ, और साथ ही यह आत्मचिंतन करने का भी अवसर है कि उन सपनों को साकार करने के लिए अभी कितना लंबा सफर बाकी है।
