देहरादून/कोटद्वार: कोटद्वार के एक दशक पुराने बहुचर्चित मोटर नगर मामले में, उत्तराखंड विकास पार्टी (यूकेडीपी) के अध्यक्ष मुजीब नैथानी की शिकायत पर हुई जांच के बाद एक बड़ी अनियमितताएं सामने आई हैं। तत्कालीन मुख्य सचिव राधा रतूड़ी के निर्देश पर अपर सचिव कार्मिक ललित मोहन रयाल द्वारा को यह जाँच सोंपी गई थी, जांच के बाद में ठेकेदार और निगम अधिकारियों की मिलीभगत का खुलासा हुआ है।
क्या है कोटद्वार मोटर नगर बस अड्डे का मामला
यह मामला कोटद्वार में नगर पालिका के स्वामित्व वाली भूमि पर पीपीपी मोड में बस अड्डा बनाने की परियोजना से जुड़ा है, जो एक दशक से अधिक समय से कानूनी दांव-पेंच में उलझा हुआ है।
घटनाक्रम का संक्षिप्त विवरण:
अनुबंध (23 मार्च, 2013): नगर पालिका और ठेकेदार फर्म ‘रमेस्थ कंस्ट्रक्शन प्रा. लि.’ के बीच दो साल में निर्माण कार्य पूरा करने का अनुबंध हुआ।
विवाद की शुरुआत: फर्म ने काम में प्रगति नहीं दिखाई। पालिका द्वारा पत्र भेजे जाने पर फर्म ने आरोप लगाया कि उसे पूरी जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई।
बेदखली का नोटिस (31 दिसंबर, 2016): कार्य में प्रगति न होने पर पालिका ने फर्म को बेदखली का नोटिस भेजा।
जिला न्यायालय का हस्तक्षेप (2017): फर्म इस नोटिस के खिलाफ जिला जज, पौड़ी की अदालत में गई, जहाँ 14 फरवरी, 2017 को ‘यथास्थिति’ (Status Quo) का आदेश दिया गया।
हाईकोर्ट का फैसला (31 मई, 2017): पालिका ने इस आदेश के विरुद्ध नैनीताल हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने जिला जज के ‘यथास्थिति’ के आदेश को खारिज कर दिया।
आर्बिटेशन में गया मामला: इसके बाद फर्म ने अनुबंध की शर्तों के अनुसार मामला आर्बिटेशन काउंसिल (मध्यस्थता परिषद) में दायर किया।
निगम के विरुद्ध फैसला (10 मई, 2022): आर्बिटेशन काउंसिल ने नगर निगम (तत्कालीन पालिका) के विरुद्ध निर्णय सुनाया।
वर्तमान स्थिति: नगर निगम ने आर्बिटेशन काउंसिल के फैसले को वाणिज्यिक न्यायालय, देहरादून में चुनौती दी है, जहाँ यह मामला वर्तमान में विचाराधीन है।
यह घटनाक्रम दर्शाता है कि कैसे यह परियोजना शुरुआती अनुबंध के बाद से ही विवादों और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं में फंसी हुई है।
जांच के मुख्य बिंदु
ठेकेदार को नहीं थी कोई बाधा: जांच में पाया गया कि अनुबंधकर्ता (ठेकेदार) ने अनुबंध के अनुसार खुदाई और 80% तक अंडरग्राउंड व सुपर स्ट्रक्चर का निर्माण कार्य पूरा कर लिया था, जिससे स्पष्ट होता है कि उसे काम करने में कोई रुकावट नहीं थी।
जमीन के क्षेत्रफल में गड़बड़ी: सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ कि डीपीआर (Detailed Project Report) में 18,380 वर्ग मीटर भूमि उपलब्ध बताई गई थी, जबकि वास्तव में केवल 15,480 वर्ग मीटर जमीन ही मौके पर उपलब्ध थी।
मिलीभगत का आरोप: उत्तराखंड विकास पार्टी का आरोप है कि अनुबंध के समय से ही ठेकेदार और निगम अधिकारियों के बीच मिलीभगत चल रही थी, जिसकी शिकायत पार्टी अध्यक्ष मुजीब नैथानी ने मुख्य सचिव से की थी।
पार्टी की मांग: पार्टी के सचिव एडवोकेट जगदीश चन्द्र जोशी ने जांच के नतीजों के आधार पर मांग की, कि अनुबंधकर्ता की जमानत राशि जब्त की जाए और मोटर नगर का संचालन नगर निगम द्वारा स्वयं किया जाए।
इस जांच से आम जनता को राहत मिलने की उम्मीद जगी है, जो इस परियोजना के लंबित होने से परेशान थी।
