उत्तराखंड के कई जिलों में घास के बड़े बुग्याल मौजूद हैं. हिमालय में ग्लेशियर से निकलने वाली जलधारा इन्हीं बुग्याल से होते हुए नदियों के रूप में आगे बढ़ती है. इस दौरान बुग्याल में मौजूद तमाम जड़ी बूटियों से निकलने वाला पानी नदियों को भी औषधीय गुण वाला बनाता है.दुनिया के सबसे ऊंचे शिव मंदिर तुंगनाथ धाम और चंद्रशिला का रास्ता खूबसूरत बुग्याल होकर गुजरता है. चोपता-तुंगनाथ-चंद्रशिला चार किमी पैदल मार्ग के दोनों तरफ सुरम्य मखमली बुग्याल हैं, लेकिन मानवीय आवागमन से इन बुग्यालों पर खतरा मंडराने लगा है. केदारनाथ वन प्रभाग ने बुग्याल में मानवीय आवागमन पर प्रतिबंध लगाते हुए चेतावनी के साइन बोर्ड लगाए हैं, लेकिन पर्यटक और यात्री नियमों को ठेंगा दिखा रहे हैं. जबिक, वन विभाग भी चालान काटने तक सीमित नजर आ रहा है. चोपता-तुंगनाथ-चंद्रशिला के आंचल में फैले भूभाग को कुदरत ने अपने वैभव का भरपूर दुलार दिया है. तुंगनाथ घाटी के पग-पग पर सुरम्यी मखमली बुग्यालों की भरमार होने के कारण इसकी विशिष्ट पहचान बन जाती है. तुंगनाथ घाटी या चोपता को ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ के नाम से जाना जाता है. तुंगनाथ घाटी के पग-पग में फैले प्राकृतिक सौंदर्य से रूबरू होने के लिए हर साल यहां लाखों तीर्थ यात्री, पर्यटक व सैलानी पहुंचते हैं. जो तुंगनाथ घाटी के इन बुग्यालों की सुंदरता को करीब से निहार कर चले जाते हैं, लेकिन भुजगली-तुंगनाथ-चोपता-चंद्रशिला पैदल मार्ग के दोनों तरफ फैले सुरम्यी मखमली बुग्यालों में मानवीय आवागमन होने से बुग्यालों की सुंदरता धीरे-धीरे गायब होने लगी है. इसके अलावा बरसात के समय बुग्यालों में उगने वाले अनेक प्रजाति के फूलों और बेशकीमती जड़ी-बूटियों पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं.
चोपता-तुंगनाथ-चद्रशिला भूभाग का जिम्मा सीमित वन कर्मियों को सौंपा गया है. केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग की ओर से पैदल मार्ग पर जगह-जगह बुग्यालों में आवागमन न करने की चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं, लेकिन उसके बाद भी सुरम्यी मखमली बुग्यालों में मानवीय आवागमन लगातार जारी है. जिससे बुग्यालों के संरक्षण व संवर्धन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. संकट में बेशकीमती जड़ी-बूटियों का जीवन: प्रसिद्ध पर्यावरणविद् ने बताया कि ‘बरसात के समय इन बुग्यालों में कुखणी, माखुणी, जया-विजया समेत अनेक प्रजाति के पुष्प अपने यौवन पर रहते हैं. अनेक प्रजाति के पुष्पों के खिलने से बुग्यालों की सुंदरता पर चार चांद लग जाते हैं. बरसात के समय ही इन बुग्यालों में अनेक प्रजाति की बेशकीमती जड़ी-बूटियां उगती हैं, लेकिन बुग्यालों में मानवीय आवागमन होने से धीरे-धीरे अनेक प्रजाति के पुष्पों और बेशकीमती जड़ी-बूटियों के जीवन पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं’पर्यावरणविद् का कहना है कि ‘यदि बुग्यालों में मानवीय आवागमन और प्रकृति के साथ मानव की ओर से समय-समय पर की जा रही छेड़छाड़ पर रोक नहीं लगी तो ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की समस्या गंभीर हो सकती है, जिसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ सकता है.’ उधर, वन विभाग का कहना है कि प्रतिबंधित क्षेत्र में जाने पर चालान किया जा रहा है. घास के मैदानों पर पिछले कई दशकों से लगातार दबाव बढ़ रहा है. यह दबाव केवल प्राकृतिक रूप से ही नहीं है, बल्कि इंसानों की तमाम गतिविधियों ने भी घास के इन बड़े मैदानों को खतरे में डाला है. जलवायु परिवर्तन के कारण घास के मैदान सिमट रहे हैं. इन इलाकों में भारी मृदा अपरदन भी हो रहा है. इसके अलावा लैंडस्लाइड से भी घास के मैदानों का स्वरूप बदल रहा है. बादल फटने जैसी घटनाओं ने भी बुग्यालों को कम किया है. इन प्राकृतिक वजहों के अलावा घास के मैदानों में पर्यटन के लिहाज से कैंपिंग और चरवाहों द्वारा घास के मैदानों में जानवरों को ले जाने, जड़ी बूटियां के अवैध दोहन की घटनाओं समेत पर्यटन गतिविधियों में प्लास्टिक के कचरे के उपयोग ने भी बुग्यालों के लिए खतरा पैदा कर दिया है.अभी ये कहना गलत होगा कि बुग्याल अभी खत्म हो जायेगे. उन्होंने बताया कि इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते है. हालांकि इस बात से वो इनकार नहीं कर रहे हैं कि ट्री लाइन के आसपास के पेड़-पौधे अब उच्च हिमालय की तरफ देखे जा रहे हैं, जो बुग्यालों की सेहत के लिए सही नहीं है. ग्लोबल वॉर्मिंग का असर पेड़-पौधों को अपने आप शिफ्ट भी कर रहा है. वन्यजीव प्रभाग द्वारा पैदल मार्ग पर जगह – जगह बुग्यालों में आवागमन न करने की चेतावनी देने के बाद भी सुरम्य मखमली बुग्यालों में मानवीय आवागमन निरन्तर जारी है। आने वाले समय में यदि बुग्यालों में मानवीय आवागमन पर रोक नहीं लगी तो सुरम्य मखमली बुग्यालों की सुन्दरता गायब होने के साथ तुंगनाथ घाटी की विशिष्ट पहचान भी धीरे – धीरे सपनों में याद रह जायेगी। नगर पंचायत अध्यक्ष कुब्जा धर्म्वाण का कहना है कि बुग्यालों की सुन्दरता के कारण तुंगनाथ घाटी की विशिष्ट पहचान है इसलिए बुग्यालों के संरक्षण व संवर्धन के लिए सामूहिक पहल होनी चाहिए , उन्होने कहा कि सुरम्य बुग्याल हमारी प्राकृतिक धरोहर है तथा अनेक प्रजाति की बेशकीमती जड़ी – बूटियों का अपार भण्डार बुग्याल मे उगता है इसलिए बुग्यालों का संरक्षण व संवर्धन जरूरी है। कांग्रेस व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश महामंत्री आनन्द सिंह रावत का कहना है कि एक तरफ डबल इंजन की सरकार तीर्थाटन, पर्यटन को बढ़ावा देने के कोरे दावे कर रही है दूसरी तरफ बुग्यालों में मानवीय आवागमन होने से बुग्यालों की सुन्दरता गायब होना स्वाभाविक ही है। उनका कहना है कि यदि प्रदेश सरकार व केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग तुंगनाथ धाम के आंचल में फैले बुग्यालों के संरक्षण व संवर्धन के लिए गम्भीर है तो चोपता में तैनात वन कर्मियों की संख्या में वृद्धि करनी चाहिए। निवर्तमान प्रधान पाली सरूणा प्रेमलता पन्त का कहना है कि मदमहेश्वर घाटी व तुंगनाथ घाटी के ऊंचाई वाले इलाकों में बुग्यालों की भरमार है तथा बुग्यालों में मानवीय आवागमन होने से जलवायु परिवर्तन की समस्या निरन्तर बढ़ती जा रही है इसलिए बुग्यालों में होने वाले आवागमन पर पूर्णतया रोक लगनी चाहिए।
नैसर्गिक सौंदर्य : बरसात के समय इन बुग्यालों में कुखणी – माखुणी, जया – विजया सहित अनेक प्रजाति के पुष्प अपने यौवन पर रहते हैं तथा अनेक प्रजाति के पुष्पों के खिलने से बुग्यालों की सुन्दरता पर चार चांद लग जाते हैं। बरसात के समय ही इन बुग्यालों में अनेक प्रजाति की बेस कीमती जडी़ – बूटियां उगती है मगर सुरम्य मखमली बुग्यालों में मानवीय आवागमन होने से धीरे – धीरे अनेक प्रजाति के पुष्पों व बेस कीमती जडी़ – बूटियों के जीवन पर भी संकट के बादल मंडराने लगे है। यदि बुग्यालों में मानवीय आवागमन व प्रकृति के साथ मानव द्वारा समय – समय पर की जा रही छेड़छाड़ पर रोक नहीं लगी तो ग्लोबल वार्मिंग तथा जलवायु परिवर्तन की समस्या गम्भीर हो सकती है जिसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ सकता है।ऊखीमठ केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग रेंज अधिकारी का कहना है कि भुजगली से चन्द्र शिला तक प्रतिबन्धित क्षेत्र में प्रवेश करने वाले 102 पर्यटकों का चालान वन अधिनियम के तहत किया गया है तथा चोपता में तैनात वन कर्मियो द्वारा चोपता से चन्द्र शिला जाने वाले पर्यटकों व सैलानियों को प्रतिबन्धित क्षेत्र मे आवागमन न करने की सलाह दी जा रही है। उन्होंने बताया की प्रकृति व बुग्यालों के संरक्षण व संवर्धन के लिए हर व्यक्ति को आगे आना होगा नही तो भविष्य मे जलवायु परिवर्तन की समस्या विकट हो सकती है। बुग्यालों का पारिस्थितिकीय संतुलन, जो हज़ारों वर्षों से स्थिर रहा है, हाल के दशकों में कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। जिसका कारण बुग्यालों में बढ़ती पर्यटन गतिविधियों है। जिससे यहां के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा है और मानव हस्तक्षेप से यहां की भूमि क्षरण की स्थिति में है, वही दूसरा कारण जलवायु परिवर्तन है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम के पैटर्न का भी बुग्यालों पर असर दिख रहा है। बर्फबारी के चक्र में बदलाव और अधिक बारिश से यहां की मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि जल्द ही इनकी सुरक्षा के लिए सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो बुग्यालों की प्राकृतिक स्थिति को बहाल करना मुश्किल हो जाएगा। सरपंच संगठन अध्यक्ष ने कहा कि बुग्यालों का संरक्षण आज समय की मांग है। यदि हमने इन्हें अभी नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अनमोल धरोहर को केवल किताबों में ही देख पाना संभव होगा बुग्याल ऊंचाई वाले चरागाहों के रूप में जाने जाते हैं, जो आज गंभीर संकट में हैं। प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधता के लिए मशहूर ये बुग्याल, अब अनियंत्रित पर्यटन, जलवायु परिवर्तन, के कारण खतरे में हैं। जिसके लिए विभाग, स्थानीय समुदायों और पर्यावरणविदों ने इनके संरक्षण के लिए आवाज़ उठाई जा रही है।विरासत को विस्तार से समझा और समझाया जा सके.
डॉ . हरीश चन्द्र अन्डोला ( दून विश्वविद्यालय )
