देहरादून: आज, 29 जुलाई को वैश्विक बाघ दिवस (Global Tiger Day) के अवसर पर, यह जानना महत्वपूर्ण है कि बाघ संरक्षण कैसे प्रकृति, पर्यटन और स्थानीय आजीविका को एक साथ समृद्ध कर सकता है। इस दिशा में उत्तराखंड का कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) एक विश्वस्तरीय मॉडल बनकर उभरा है।
बाघों की बढ़ती संख्या: कॉर्बेट टाइगर रिजर्व दुनिया का सबसे अधिक बाघ घनत्व वाला क्षेत्र बन गया है। यहाँ बाघों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।
- 2006: 150 बाघ (लगभग )
- 2014: 215 बाघ
- 2022: 260 से अधिक बाघ
अनुमान: अगली गणना में यह संख्या 300 के करीब पहुँचने का अनुमान है।
जैव विविधता का केंद्र: कॉर्बेट सिर्फ बाघों का घर नहीं है, बल्कि यह एक जैव विविधता हॉटस्पॉट भी है। यहाँ 1200 से अधिक हाथी, 500 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियाँ, 150 से अधिक तितलियों की प्रजातियाँ और 110 से ज्यादा किस्मों के पेड़-पौधे पाए जाते हैं।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: बाघ संरक्षण और पर्यटन ने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए हैं।
क्षेत्र में 300 से अधिक रिसॉर्ट्स और होमस्टे संचालित हो रहे हैं।
लगभग 20,000 से अधिक लोगों को गाइड, ड्राइवर, और होटल कर्मचारी के रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है।
सफलता के साथ बढ़ती चुनौतियां
बढ़ती बाघों की संख्या जहाँ प्रोजेक्ट टाइगर (1973 में शुरू) की सफलता को दर्शाती है, वहीं इसने मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती को भी जन्म दिया है।
स्थानीय लोगों की चिंता: जंगल में बाघों का बढ़ता दबाव अन्य जानवरों जैसे गुलदारों को इंसानी बस्तियों की ओर धकेल रहा है, जिससे हमलों का खतरा बढ़ गया है।
दोहरी जिम्मेदारी: वन विभाग के सामने अब बाघों की सुरक्षा के साथ-साथ इंसानों को भी उनके संभावित खतरों से बचाने की दोहरी जिम्मेदारी है।
भविष्य की कार्ययोजना
इस चुनौती से निपटने के लिए कॉर्बेट प्रशासन एक विस्तृत कार्ययोजना पर काम कर रहा है, जिसमें अवैध शिकार पर सख्त निगरानी, मानव-पशु संघर्ष के समाधान के लिए ठोस रणनीति, और पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देना शामिल है।
कॉर्बेट की सफलता यह साबित करती है कि यदि संरक्षण योजनाओं को सही ढंग से लागू किया जाए, तो न केवल बाघों को बचाया जा सकता है, बल्कि स्थानीय विकास और समृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
साभार : डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
