उत्तराखंड कांग्रेस में हुए हालिया संगठनात्मक फेरबदल का एक विश्लेषण
उत्तराखंड की राजनीति में मुख्य रूव से कांग्रेस और बीजेपी दो बड़ी पार्टियां रही हैं। जो हर चुनाव में आमने सामने रहती हैं। साथ ही कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के बीच क्षेत्रिय बैलेंस बनाती आई हैं। लेकिन इस बार कांग्रेस ने इस रीजनल फॉर्मूले को किनारे किया है। इसकी दो वजह मानी जा रही हैं। पहली ये है कि जब 2016 में हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में बगावत हुई थी तो उसके सूत्रधार तब मंत्री रहे हरक सिंह रावत रहे थे। उन बगावत के बाद कांग्रेस की गढ़वाल में राजनीतिक तौर पर जो हालत हुई, वो आज तक नहीं संभल पाई। हरिद्वार जिले को छोड़कर बाकी गढ़वाल मंडल के पहाड़ी जिलों से कांग्रेस के सिर्फ तीन विधायक हैं। देहरादून जिले से प्रीतम सिंह, टिहरी जिले से विक्रम सिंह और बाई इलेक्शन में चमोली जिले से जीते लखपत बुटोला।
नए रिशफल में गणेश गोदियाल, प्रीतम सिंह और हरक सिंह रावत प्रमुख चेहरे हैं और तीनों ही गढ़वाल मंडल की राजनीति में खासे सक्रिय हैं। पार्टी अध्यक्ष रहे प्रीतम सिंह इकलौते नेता हैं जो हालिया पंचायत चुनाव में देहरादून जिले में कांग्रेस को जीत दिलवा पाए। वहीं गोदियाल ने लगातार आक्रामक छवि बनाई है। दूसरी तरह चुनाव के लिए मैनेजमेंट की जिम्मेदारी हरक सिंह को दी गई है। कांग्रेस की राजनीति के लिहाज से ये बड़ा कदम है, क्योंकि एक समय ऐसा था जब कांग्रेस आलाकमान हरक सिंह को लेकर अनमना था। पूर्व मंत्री रहे, एक प्रमुख कांग्रेस नेता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि हरक सिंह बेशक भरोसे तोड़ने के लिए कुख्यात हों पर उनका तजुर्बा मौजूदा नेताओं में बढ़िया है। उत्तराखंड में लगातार दो विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव हारने के बाद, कांग्रेस ने 2027 के ‘करो या मरो’ वाले विधानसभा चुनाव के लिए एक बड़ा दांव खेला है। पार्टी आलाकमान ने करण मेहरा को हटाकर संगठन में बड़ा फेरबदल किया है और तीन प्रमुख नेताओं की ‘तिगड़ी’ पर भरोसा जताया है।
कांग्रेस की नई ‘तिगड़ी’ और उनकी भूमिका:
- गणेश गोदियाल (प्रदेश अध्यक्ष): अपनी आक्रामक छवि के लिए जाने जाने वाले गोदियाल को दोबारा पार्टी की कमान सौंपी गई है।
- प्रीतम सिंह (चुनाव प्रचार प्रमुख): पूर्व अध्यक्ष प्रीतम सिंह को भी अहम भूमिका दी गई है, खासकर तब जब उन्होंने हालिया पंचायत चुनावों में देहरादून में पार्टी को जीत दिलाई।
- डॉ. हरक सिंह रावत (चुनाव प्रबंधन प्रमुख): 2016 की बगावत के सूत्रधार रहे हरक सिंह को उनकी विवादास्पद छवि के बावजूद, उनके चुनावी प्रबंधन के तजुर्बे को देखते हुए यह बड़ी जिम्मेदारी दी गई है।
फेरबदल के पीछे की रणनीति: गढ़वाल पर फोकस
इस बार कांग्रेस ने पारंपरिक कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के क्षेत्रीय संतुलन को दरकिनार कर दिया है। यह तीनों ही नेता (गोदियाल, हरक, प्रीतम) गढ़वाल मंडल की राजनीति के दिग्गज हैं।
इसके पीछे मुख्य कारण 2016 की बगावत के बाद गढ़वाल के पहाड़ी जिलों में कांग्रेस की लगभग समाप्त हो चुकी राजनीतिक जमीन को फिर से हासिल करना है। हरिद्वार को छोड़कर, गढ़वाल के बाकी पहाड़ी जिलों से कांग्रेस के पास गिने-चुने विधायक ही हैं। पार्टी इस ‘तिगड़ी’ के सहारे गढ़वाल में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
प्रमुख चुनौतियाँ और अनसुलझे सवाल:
- हरीश रावत का भविष्य: इस नए फेरबदल में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को कोई औपचारिक भूमिका नहीं दी गई है। हालांकि कुछ नेता इसे सही मान रहे हैं, लेकिन एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि हरीश रावत का कद इतना बड़ा है कि उन्हें नजरअंदाज करना पार्टी की बड़ी गलती साबित हो सकती है।
- गुटबाजी साधना: कांग्रेस की राजनीति सपाट नहीं है। नए प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के विभिन्न गुटों को साधना और इस “रपटीली राह” पर सबको एक साथ लेकर चलना होगी। हालांकि 27 नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में हरीश रावत और करण मेहरा के समर्थकों को जगह देकर संतुलन बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन यह संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।
- हरक सिंह का फैक्टर: हरक सिंह रावत को “भरोसा तोड़ने के लिए कुख्यात” माना जाता है, लेकिन उनका चुनावी प्रबंधन बेजोड़ है। कांग्रेस आलाकमान का यह दांव कितना सफल होगा, यह देखने वाली बात होगी।
