उनके दर पे पहुँच कर भी, पहुँच न सका,
नज़रें यों झुकीं, हम सलाम कह न पाये।
रंजो-ग़म भूलकर, हम ज्यों गले मिले,
ख़ंजर जिगर के पार, मिलते रहे गले।
हमारी चाहत में, उनका हक़ है बेशक,
दीवार शर्मो हया की, ढहने न पाये।
सलीक़े से पलकों पे, बिठा लिया हमने,
आँखें खुलीं तो हर सू , उन्हें ढूँढ़ता-फिरा।
कुछ ख़ास होकर हम, अपने घर से निकले थे,
तबस्सुम की बिजली गिरी, हम आम हो लिये।
उनकी मुसकुराहट पे, हैं लोग कैसे लुट रहे !
शातिर होठों से हमारी बातें अक्सर होती हैं।
