यह लेख डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला द्वारा उत्तराखंड में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं पर एक गंभीर और विश्लेषणात्मक टिप्पणी है, जिसमें हाल ही में उत्तरकाशी की धराली में हुई तबाही को एक चेतावनी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक का तर्क है कि देवभूमि उत्तराखंड अब केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि अनियोजित विकास, मानवीय हस्तक्षेप और पारिस्थितिक असंतुलन के कारण आपदाओं का केंद्र बनता जा रहा है।
आपदाओं का गढ़ बनता देवभूमि: एक विश्लेषण
मुख्य तर्क:
लेखक का मानना है कि उत्तराखंड में भूस्खलन, बादल फटना और बाढ़ जैसी घटनाएं अब महज “प्राकृतिक आपदा” नहीं रह गई हैं। IIT रुड़की और NDMA जैसे संस्थानों के शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि इन आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता लगातार बढ़ रही है, जिसके पीछे जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ अनियोजित विकास, अंधाधुंध निर्माण और पहाड़ों के साथ हो रही छेड़छाड़ प्रमुख कारण हैं।
उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील आपदा क्षेत्र
लेख में राज्य के कुछ सबसे अधिक आपदा-प्रवण (Disaster-Prone) जिलों का विश्लेषण किया गया है:
उत्तरकाशी: यह जिला लगातार भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं का सामना कर रहा है (जैसा कि धराली में हुआ)। गंगोत्री और यमुनोत्री के मार्गों पर तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण यहाँ ग्लेशियर झील विस्फोट (GLOF) का खतरा भी बना हुआ है।
चमोली: जोशीमठ में हो रहा भू-धंसाव यहाँ की सबसे बड़ी चिंता है। इसके अलावा, फरवरी 2021 में रैणी गाँव में ग्लेशियर टूटने से हुई भीषण तबाही यह दर्शाती है कि यह क्षेत्र कितना संवेदनशील है।
पिथौरागढ़ (विशेषकर धारचूला): यह सीमांत क्षेत्र भूस्खलन, बादल फटने और नदियों के कटाव, इन तीनों खतरों का एक साथ सामना करता है। यहाँ की नाजुक भौगोलिक बनावट और कमजोर बुनियादी ढांचा हर मानसून में जीवन को जोखिम में डाल देता है।
रुद्रप्रयाग: मंदाकिनी और अलकनंदा के संगम पर स्थित यह जिला 2013 की केदारनाथ त्रासदी की विनाशलीला का गवाह रहा है। यहाँ अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन सबसे बड़ी चुनौती हैं।
नैनीताल (कुमाऊं क्षेत्र): अपनी झीलों के लिए प्रसिद्ध यह क्षेत्र अब भूस्खलन, जल रिसाव और जमीन धंसने जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। नैनी झील का असंतुलित होता जलस्तर एक बड़े खतरे का संकेत है।
आपदाओं के मूल कारण: प्रकृति से छेड़छाड़
लेखक के अनुसार, इन आपदाओं के पीछे मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियाँ जिम्मेदार हैं:
अनियोजित विकास: पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाना, सुरंग आधारित बड़े बांधों का निर्माण और नदी तटों पर अवैध कब्जे जैसी गतिविधियों ने पहाड़ों को कमजोर कर दिया है।
बढ़ता पर्यटन का दबाव: पिछले दो दशकों में पर्यटकों की संख्या 1 करोड़ से बढ़कर 5 करोड़ हो गई है, जिससे नाजुक पारिस्थितिकी पर भारी दबाव पड़ा है।
बिल्डर-राजनेता गठजोड़: विकास के नाम पर हो रहे अवैध निर्माण और नियमों की अनदेखी के पीछे बिल्डरों और राजनेताओं का गठजोड़ एक बड़ा कारण है।
निष्कर्ष और चेतावनी
लेखक एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं। धराली की आपदा एक बड़ी चेतावनी है कि अगर अब भी नियोजित विकास और पारिस्थितिकीय संतुलन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में उत्तराखंड को ऐसे कई और विनाशकारी हादसों का सामना करना पड़ेगा। अब समय आ गया है कि विकास और पर्यावरण के बीच एक संतुलन रेखा खींची जाए, अन्यथा यह देवभूमि संकटग्रस्त भूमि बनकर रह जाएगी।
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