ब्रह्मकमल, जो उत्तराखंड का राज्य पुष्प है, कमल की अन्य प्रजातियों के विपरीत पानी में नहीं, बल्कि 3,000 से 5,000 मीटर की ऊँचाई पर हिमालय की बर्फीली ढलानों पर खिलता है। यह फूल अपनी सुंदरता, सुगंध, दिव्य और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है। इस वर्ष केदारघाटी, चमोली, और पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ब्रह्मकमल बहुतायत में खिला है, जिससे मखमली बुग्यालों (घास के मैदानों) की सुंदरता और भी बढ़ गई है।
धार्मिक और पौराणिक महत्व
ब्रह्मकमल का हिंदू पौराणिक कथाओं में गहरा स्थान है और इसे ‘जीवनदायिनी’ माना जाता है।
शिव-विष्णु प्रसंग: पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु ने भगवान शंकर का एक हजार ब्रह्मकमल से अभिषेक किया तो भगवान विष्णु की परीक्षा लेने के लिए भगवान शंकर ने एक ब्रह्मकमल पुष्प को गायब कर दिया.भगवान शंकर के अभिषेक के दौरान जब एक पुष्प कम पड़ा तो भगवान विष्णु ने अपना दाहिने नेत्र से भगवान शंकर का अभिषेक किया जिससे प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें ‘कमल नयन’ का नाम दिया।
भगवान गणेश का पुनर्जन्म: मान्यता है कि जब भगवान शिव ने गणेश के धड़ पर हाथी का सिर लगाया, तब भगवान ब्रह्मा ने इसी फूल की पंखुड़ियों से जल छिड़ककर उनमें प्राणों का संचार किया था।
रामायण और महाभारत से जुड़ाव: रामायण में लक्ष्मण के ठीक होने पर देवताओं द्वारा ब्रह्मकमल बरसाने का उल्लेख है, जिनसे ‘फूलों की घाटी’ की उत्पत्ति मानी जाती है। महाभारत में, द्रौपदी को वनवास के दौरान इसके दर्शन से असीम शांति मिली थी।
सांस्कृतिक और औषधीय उपयोग
स्थानीय परंपरा: उत्तराखंड के गांवों में अगस्त माह में होने वाले धार्मिक मेलों में स्थानीय लोग इन फूलों को अपने आराध्य देवों (जैसे माँ नंदा और भगवती राकेश्वरी) को अर्पित करते हैं और प्रसाद के रूप में वितरित करते हैं।
औषधीय गुण: इस फूल का उपयोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जाता है, जिसके कारण काले बाजार में इसकी भारी मांग है।
अस्तित्व पर संकट और संरक्षण के प्रयास
ब्रह्मकमल का खिलना एक दुर्लभ घटना है, क्योंकि यह रात में खिलता है और केवल कुछ घंटों तक ही रहता है। लेकिन मानवीय हस्तक्षेप ने इसके अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है।
अत्यधिक दोहन: धार्मिक और औषधीय महत्व के कारण इसका बड़े पैमाने पर दोहन हो रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक अध्ययन के अनुसार, इसकी आबादी में 70% की गिरावट आई है।
संरक्षण के कदम: केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग ‘ब्रह्म वाटिका’ बनाकर इसके संरक्षण का प्रयास कर रहा है। इसके अलावा, चमोली, उत्तरकाशी जैसे जिलों में इसकी खेती को बढ़ावा देने और पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम शुरू करने जैसे उपाय सुझाए गए हैं।
यह दुर्लभ और दिव्य पुष्प आज संरक्षण की मांग कर रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ केवल कथाओं में ही इसका वर्णन न पढ़ें, बल्कि इसकी सुंदरता को साक्षात देख भी सकें।
साभार :हरीश चंद्र अंडोला (दून विश्वविद्यालय)
