
डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत में वर्षाकाल मे भीषण प्राकृतिक वर्षा के फलस्वरुप बाढ़ भूस्खलन और नदियों में उफान आने से ,उत्तराखंड,असम,मेघालय, दिल्ली और पंजाब भीषण त्रासदी झेल रहे हैं और बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु भी हो गई है। देश के साथ एकसाथ विश्व में कई देशों में अतिवृष्टि से बाढ़ का प्रकोप होता है लैंड स्लाइडिंग भी होती है पर सर्वाधिक मृत्यु भारत में ही होती है। भारत में भूकंप के झटके भी लगते हैं कई बार भूकंप भी आता है और जान माल की हानि होती है।यह ऐसा तो है नहीं कि अति वर्षा कई सालों में एक बार होती हो,वर्षा,बाढ़ तथा लैंड स्लाइडिंग का प्रकोप हर वर्ष अखबारों में हम पढ़ते हैं और लोगों की मृत्यु होती है तो ऐसे में केंद्र तथा राज्य सरकारों को आपस मैं सामंजस्य कर इस त्रासदी तथा विपदा का पहले से प्रबंध करने की आवश्यकता होनी चाहिए जिससे आमजन को जान माल का कम से कम नुकसान हो सके। आपदा सदैव अनअपेक्षित घटना होती है। जो मानवीय नियंत्रण से बाहर तथा प्राकृतिक व मानवीय कारकों द्वारा मूर्त रूप दी जाती है। प्राकृतिक आपदा अल्प समय में बिना किसी पूर्व सूचना के घटित होती है,जिससे मानव जीवन के सारे क्रियाकलाप अवरुद्ध हो कर,जान और माल की बड़ी हानि होती है ।
आपदा की गहनता, विशालता एवं निरंतरता मानव जीवन तथा समाज, देश को बड़ी हानि पहुंचाते हैं, एवं उस देश की आर्थिक स्थिति में गहरी चोट करते हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं से देश की प्रगति पर चोट पहुंचती है। तथा राष्ट्र को आर्थिक रूप से बहुत पीछे खींच कर ले जातीहै।आपदा प्रबंधन में जापान से सीख ली जा सकती है। क्योंकि जापान आपदा प्रबंधन में विश्व में अग्रणी देश माना जाता है। जापान पृथ्वी के ऐसे क्षेत्र में अवस्थित है,जहां भूकंप, सुनामी,ज्वालामुखी जैसी प्राकृतिक आपदाएं सदैव आती रहती हैं। जापान में आपदा प्रबंधन की अत्याधुनिक तकनीक को याकोहामा रणनीति कहा जाता है। जापान में आपदा प्रबंधन की साल भर नियमित रूप से मॉनिटरिंग कर एक्सरसाइज की जाती रहती है, एवं आपदाओं पर निरंतर निगरानी तथा नजर रखी जाती है,एवं इसके निदान के लिए पूर्व से ही सुनियोजित योजना बनाकर नागरिकों को सुरक्षित कर लिया जाता है। भारत को भी इसी तरह आपदा प्रबंधन को अपनाकर हमें बाढ़, अतिवृष्टि, लैंडस्लाइडिंग तथा भूकंप से पूरी क्षमता कथा विशेषताओं के साथ सामना करना चाहिए।आपदाओं के प्रति मानवीय सभ्यता के संदर्भ में समाज के आर्थिक सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग को ज्यादा प्रभावित करती है। एवं समाज का सबसे संवेदनशील तबका यानी वृद्ध व्यक्ति,महिलाएं, बच्चों,दिव्यांग लोगों को प्राकृतिक आपदाओं से सबसे ज्यादा खतरा बना रहता है।
आपदा के समय सबसे ज्यादा निम्न आय वर्ग का व्यक्ति तथा मजदूर तबके का व्यक्ति सबसे ज्यादा प्रभावित होकर उसकी दिनचर्या समूह रूप से छिन्न-भिन्न हो जाती है, एवं आर्थिक साधन भी नष्ट हो जाते हैं, जिससे उसे आजीविका का एक बड़ा भय सताने लगता है।भारत के भू भाग का लगभग 58 प्रतिशत क्षेत्र भूकंप की संभावना वाला क्षेत्र है, जिसमें हिमालयिन क्षेत्र, पूर्वोत्तर राज्य,गुजरात का कुछ क्षेत्र,अंडमान निकोबार द्वीप समूह भूकंप की दृष्टि से सबसे सक्रीय क्षेत्र रहें है। देश के 65 से 68 प्रतिशत भूभाग पर कभी कम कभी ज्यादा भीषण रूप से सूखा पड़ता है,इसी तरह भारत के पश्चिमी और प्रायद्वीपीय राज्य में मुख्यतः शुष्क तथा अर्ध शुष्क न्यून नमी वाले क्षेत्र सूखे से सदैव प्रभावित रहते हैं। बाढ़ से प्रभावित भूमि का विस्तार क्षेत्र देश के 12 प्रतिशत है, यानी 7 करोड़ हेक्टेयर जमीन में भूकंप आने की संभावना सदैव बनी रहती है। हिमालय क्षेत्र देश के पर्वतीय क्षेत्र मैं भूस्खलन की गंभीर समस्या की संभावना सदैव बनी रहती है। देश के विशाल तटवर्ती क्षेत्र में चक्रवात तथा सुनामी की भयावह स्थिति की संभावना सदैव बनी रहती है।अब भारत में विश्व के साथ-साथ करोना संक्रमण की भयानक महामारी से प्रभावित होकर हजारों लाखों नागरिकों की जान गवा कर इस आपदा से जंग लड़ रहा है, यह कोविड-19 की महामारी या आपदा प्राकृतिक है या मानव निर्मित यह तो भविष्य ही बताएगा, किंतु इस महामारी ने पूरे वैश्विक स्तर पर आकस्मिक रूप से मानव जीवन में मृत्यु का तांडव मचा के रख दिया है। ऐसी ही अनपेक्षित आपदाओं का पूर्वानुमान अथवा आकलन किया जाना पहले से संभव नहीं हो सकता है। ऐसे में राष्ट्रीय अन्य योजनाओं के साथ-साथ आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अत्यधिक सावधानी पूर्वक योजना तथा विभाग बनाने चाहिए, देश में जापान जैसे देश की तरह आपदा प्रबंधन से निपटने के लिए अत्याधुनिक आपदा प्रबंधन सिस्टम को तैनात कर तैयार रखने की आवश्यकता होगी।भारत को आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग को चुस्त-दुरुस्त तथा अत्याधुनिक तकनीक से युक्त रखने की आवश्यकता है। तूफानी चक्रवात, सुनामी, भूस्खलन,भूकंप, सूखा बाढ़ के अलावा अब कोविड-19 यानी करोना संक्रमण जैसी खतरनाक बीमारियां भारत देश को अपना निशाना बना कर रखा है ।ऐसे में भारत में मध्यम दर्जे का या निम्न दर्जे का आपदा प्रबंधन सिस्टम किसी भी काम का ना रहेगा, एवं इससे भारी जानमाल की हानि होने की संभावना सदैव बनी रहेगी।
भारत में आपदा प्रबंधन के लिए 1990 में कृषि मंत्रालय के अंतर्गत डिजास्टर मैनेजमेंट सेल स्थापित किया गया था। लेकिन 1993 में लातूर के भूकंप तथा 1998 में मालपा के भूस्खलन तथा 1999 में ओडिशा में सुपर साइक्लोन तथा 2001 में भुज के भूकंप के बाद देश में एक मजबूत आपदा प्रबंधन की व्यवस्था की जरूरत को महसूस करते हुए जे,सी,पंत जी की अध्यक्षता में हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट में एक सुव्यवस्थित तथा व्यापक सिस्टम तथा विभाग की स्थापना की आवश्यकता प्रतिवेदित की गई थी। 2002 में आपदा को देश की आंतरिक सुरक्षा का मामला मानते हुए आपदा को गृह मंत्रालय के अंतर्गत समाविष्ट किया गया। आपदा प्रबंधन के इतिहास में 2005 में एक बड़ा परिवर्तन लाया गया भारत सरकार ने आपदा को अपनी कार्ययोजना के एक चक्रीय क्रम के रूप में प्रबंधित किया,जिसमें आपदा आ जाने के बाद इसके बचाव, नुकसान की भरपाई,निदान तथा आपदा आने के पूर्व की तैयारी तथा योजना को मूर्त रूप देने का एक सुनियोजित तरीका तैयार किया गया था। आपदा से खतरे का स्तर सभी इंसानों के लिए सदैव एक जैसा होता है। किंतु समाज के विभिन्न वर्गों में खतरे से निपटने तथा जूझने की क्षमता अलग-अलग होती है। निम्न वर्ग का तबका अन्य लोगों की अपेक्षा आपदा से ज्यादा प्रभावित होता है। अतः सरकार को गरीब तथा वंचित वर्ग के तबके के लिए आपदा प्रबंधन में विशेष प्रावधान दिया जाना चाहिए। आपदाओं के प्रबंधन एवं अनुसंधान व त्वरित कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान तथा राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल का गठन किया गया है। यह आपदा राशि कार्रवाई बल पर किसी खतरनाक आपदा की स्थिति में रासायनिक,जैविक,परमाणु विकिरण तथा अन्य प्राकृतिक एवं मानव निर्मित आपदा के संबंध में विशिष्ट कार्यवाही के निर्वहन का उत्तरदायित्व है। इस संस्था ने बंगाल तथा उड़ीसा के तटीय क्षेत्र में आई सुनामी में काफी बड़ी संख्या में लोगों की जान भी बचाई है। चक्रवाती तूफान से निपटने में हमारे समुचित प्रयासों ने यह सिद्ध कर दिया है कि हाल के वर्षों में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। परंतु पिछले 1 वर्षों से करोना संक्रमण से हुई बड़ी संख्या में मृत्यु ने देश को हिला कर रख दिया है।अगर आपदा प्रबंधन सिस्टम को लगातार मॉनिटर किया जाता एवं उस सिस्टम के अधिकारी जिम्मेदार व्यक्ति सचेत एवं सजग रहते, तो द्वितीय लहर में इस तरह हड़कंप संक्रमण एवं मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ता।
भारत को आपदा प्रबंधन के सिस्टम पर फिर से आंकलन कर एक नई व्यूह रचना बनाकर गरीब तबके निचले व्यक्ति तथा समग्र रूप से मानव जाति की सुरक्षा के लिए नए-नए उपाय करने चाहिए। क्योंकि आपदा कभी बताकर नहीं आती।इसी तरह कोविड-19 की तीसरी लहर की आशंका को ध्यान में रखते हुए हमें इसकी तैयारी पूर्व से ही कर लेना चाहिए अन्यथा हाथ मलने के अलावा अपने पास कुछ ना रह जाएगा। राज्य में भू-स्खलन का पूर्वानुमान हो सकेगा। इसके लिए सरकार अर्ली वार्निंग की इनसार (इंटरफेरोमैट्रिक सिंथेटिक अपरचर रडार) तकनीकी का उपयोग करेगी। केंद्र व राज्य के स्तर पर इस दिशा में मंथन तेज हो गया है। उत्तराखंड, के सचिव आपदा प्रबंधन का कहना है कि इससे हर साल भू-स्खलन की वजह से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकेगा। राज्य में भूस्खलन गंभीर समस्या है। हर साल इससे भारी नुकसान होता है। भूस्खलन या किसी अन्य आपदा को समझने के लिए, उसका सामना करने के लिए, पुख्ता तैयारी के लिए बहुत सारे विषयों को एक समग्र दृष्टिकोण से समझना होगा। तभी हम आपदा सुरक्षित प्रदेश की कल्पना को सार्थक कर पाएंगे। सड़क काटने के बाद एक पुश्ता लगाने भर से काम नहीं चलेगा। हमें वहां के भूविज्ञान को समझना होगा।भू-भौतिक विज्ञान को समझना होगा। इंजीनियरिंग के साथ जल विज्ञान तथा मिट्टी की संरचना को समझना होगा। भूस्खलन का सामना करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत है। पहाड़ों में ढलानों को जब किसी विकास संबंधित गतिविधि के लिए डिस्टर्ब किया जाता है तो उसी समय उसका उचित ट्रीटमेंट भी किया जाना जरूरी है, ताकि वह स्थान भविष्य में किसी प्रकार से भी आपदा के लिहाज से खतरा न बने। उन्होंने कहा कि जब भी पहाड़ों में कोई निर्माण होता है तो उससे पहले ही उस स्थान की सॉयल बीयरिंग कैपेसिटी का अध्ययन किया जाना चाहिए। अगर ऐसा होगा तो आपदा और उसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अगर हम देखें तो सबसे ज्यादा भूस्खलन की घटनाएं सड़कों के किनारे हो रही हैं। तो कहीं न कहीं सड़क निर्माण के कारण पहाड़ों का स्लोप डिस्टर्ब हो रहा है। सड़कों को बनाया जाना जरूरी है, लेकिन यह उससे भी जरूरी है कि उसी समय स्लोप का वैज्ञानिक तरीके से उचित ट्रीटमेंट किया जाए।
उत्तराखंड में लगातार हो रही भारी बारिश ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। हाल ही में हुए एक बड़े भूस्खलन के कारण 15 गांवों का संपर्क मुख्य सड़कों से पूरी तरह कट गया है, जिससे हजारों ग्रामीणों की आवाजाही और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो गई है।भूस्खलन की वजह से न केवल सड़कें बंद हैं, बल्कि मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं भी पूरी तरह बाधित हो गई हैं। इस स्थिति में ग्रामीण प्रशासन से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं और किसी भी आपातकालीन स्थिति में मदद मिलना मुश्किल हो गया है।स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग की टीमें राहत और पुनर्स्थापना कार्यों में जुटी हैं, लेकिन खराब मौसम के कारण काम में रुकावट आ रही है। क्षेत्रीय लोग पीने के पानी, राशन और चिकित्सा सुविधा की कमी का सामना कर रहे हैं।ग्रामीणों ने सरकार से शीघ्र सड़क मार्ग खोलने और वैकल्पिक मोबाइल टावर या सेटेलाइट कनेक्टिविटी की मांग की है, ताकि आपातकालीन सेवाएं बहाल की जा सकें और लोगों को राहत मिल सके।

